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उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु, अर्थ, प्रयोग (Udhare ant na hohi nibahu, Kalnemi jimi Ravan Rahu)

परिचय: “उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु” यह हिंदी की एक प्राचीन कहावत है, जो धोखेबाज व्यक्ति के अंत की अनिवार्यता को दर्शाती है।

अर्थ: इस कहावत का अर्थ है कि जो व्यक्ति धोखाधड़ी करता है, उसका अंत समय पर निश्चित होता है। उस पर अनेक विपत्तियाँ आती हैं, और वह बच नहीं पाता।

उपयोग: यह कहावत तब प्रयोग की जाती है जब कोई धोखेबाज व्यक्ति अपनी चालाकियों में फंस जाता है और उसका पर्दाफाश होता है।

उदाहरण:

-> मान लीजिए, एक व्यापारी जो अपने ग्राहकों को लगातार धोखा दे रहा था, एक दिन उसकी सच्चाई सामने आ गई। उसके धंधे पर भारी नुकसान हुआ और उसकी प्रतिष्ठा भी खो गई। इस पर लोगों ने कहा, “उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु।”

समापन: “उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु” कहावत हमें सिखाती है कि धोखाधड़ी का मार्ग हमेशा विनाश की ओर ले जाता है। यह हमें यह भी सिखाती है कि सच्चाई और ईमानदारी का मार्ग ही सबसे उत्तम है और इसी से स्थायी सफलता और सम्मान प्राप्त होता है। इस पोस्ट में, इस कहावत के अर्थ और उसके प्रयोग को धोखाधड़ी के अंतिम परिणामों के संदर्भ में बताया गया है, जो हमें नैतिकता और सत्य के मार्ग की महत्ता सिखाता है।

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उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु कहावत पर कहानी:

बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में करण नाम का एक चालाक व्यापारी रहता था। करण अपनी चतुराई से लोगों को धोखा देकर अपना व्यापार बढ़ा रहा था। उसने गाँववालों से झूठ बोलकर उनकी जमीनें सस्ते दामों में खरीदी और फिर उन्हें महंगे दामों में बेच दिया।

धीरे-धीरे, करण की सच्चाई गाँववालों के सामने आ गई। उन्होंने उसके खिलाफ फैसला किया और उसे गाँव से निकाल दिया। करण ने भागकर दूसरे गाँव में शरण ली, लेकिन वहाँ भी उसकी चालाकियाँ जल्दी ही सामने आ गईं।

इस तरह, करण एक गाँव से दूसरे गाँव भटकता रहा, लेकिन हर जगह उसका पर्दाफाश हो जाता। उसके धोखे की वजह से उसे कहीं भी शांति और सम्मान नहीं मिला। आखिरकार, उसे समझ आया कि उसके कर्मों का फल उसे भोगना पड़ रहा है।

गाँव के एक बुजुर्ग ने यह सब देखकर कहा, “बेटा, तुमने जो बोया था, वही काट रहे हो। ‘उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु’। धोखाधड़ी का अंत हमेशा दुखद होता है।”

करण ने अपनी गलतियों से सबक लिया और ईमानदारी के पथ पर चलने का प्रण लिया। इस कहानी से हमें सीखने को मिलता है कि धोखाधड़ी और चालाकी का अंत हमेशा बुरा होता है, और सच्चाई और ईमानदारी ही जीवन का सही मार्ग है।

शायरी:

छल की राहों पे चलकर, जो समझे खुद को शाह,

वक्त की लहर में बहकर, वो रहे न कभी राह।

“उधरे अंत न होहि निबाहू”, कहावत यही कहती,

जो बोया है धोखे का, वो काटे बिन बहती।

आसमान में उड़ने की, ख्वाहिशों का क्या है फायदा,

जब जमीन पे रखे कदम, तभी मिले जीवन का सायदा।

कालनेमि जिमि रावण राहू, उनके किस्से सब जानें,

जिनके धोखे की चालाकी, आखिर में खुद ही पछताने।

इंसानियत की राह पर, चलो तो दुनिया सलाम करे,

धोखे की दौड़ में जो चले, उसका अंत तमाम करे।

 

उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।


Hindi to English Translation of उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु – Udhare ant na hohi nibahu, Kalnemi jimi Ravan Rahu Proverb:

Introduction: “उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु” is an ancient Hindi proverb that highlights the inevitability of the downfall of a deceitful person.

Meaning: The proverb means that a person who engages in deception is bound to face an inevitable end. Such a person is afflicted with many calamities and cannot escape.

Usage: This proverb is used when a deceitful person gets trapped in their own cunning and gets exposed.

Examples:

For instance, a businessman who was continuously deceiving his customers was eventually exposed. He suffered significant losses in his business and lost his reputation as well. People then said, “उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु।”

Conclusion: “उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु” teaches us that the path of deceit always leads to destruction. It also imparts the lesson that the path of truth and honesty is the best and leads to lasting success and respect. This post has explained the meaning and application of this proverb in the context of the ultimate consequences of deceit, teaching us the importance of morality and truth.

Story of Udhare ant na hohi nibahu, Kalnemi jimi Ravan Rahu Proverb in English:

Once upon a time, in a small village, there lived a cunning merchant named Karan. He expanded his business by deceiving people using his cleverness. He lied to the villagers and bought their lands at low prices, only to sell them later at higher rates.

Gradually, the truth about Karan came to light for the villagers. They decided against him and expelled him from the village. Karan fled and sought refuge in another village, but his deceitful ways were soon exposed there as well.

Thus, Karan wandered from one village to another, but his deceit was always revealed, and he found neither peace nor respect anywhere. Eventually, he realized that he was facing the consequences of his actions.

An elder in the village, witnessing all this, commented, “Son, you are reaping what you sowed. ‘उधरे अंत न होहि निबाहू । कालनेमि जिमि रावण राहु’. The end of deceit is always sorrowful.”

Karan learned from his mistakes and vowed to follow the path of honesty. This story teaches us that the end of deception and cunning is always bad, and truth and honesty are the right paths in life.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly.

FAQs:

इस कहावत का मुख्य संदेश क्या है?

इस कहावत का मुख्य संदेश यह है कि कुछ समस्याएँ या बुराइयाँ अत्यंत जटिल होती हैं और उनका समाधान आसान नहीं होता।

क्या इस कहावत का आधुनिक जीवन में कोई महत्व है?

हाँ, आधुनिक जीवन में इस कहावत का महत्व है, यह हमें सिखाती है कि कुछ समस्याओं का समाधान ढूंढना अत्यंत कठिन हो सकता है।

इस कहावत का उपयोग नैतिक शिक्षा में कैसे किया जा सकता है?

नैतिक शिक्षा में, इस कहावत का उपयोग यह बताने में किया जा सकता है कि कुछ बुराइयाँ या चुनौतियाँ लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

क्या इस कहावत से जीवन के प्रति कोई शिक्षा मिलती है?

हाँ, इस कहावत से यह शिक्षा मिलती है कि हमें दीर्घकालिक समस्याओं का सामना धैर्य और दृढ़ता से करना चाहिए।

क्या इस कहावत में कोई सकारात्मक पक्ष है?

इस कहावत का सकारात्मक पक्ष यह है कि यह हमें समस्याओं का सामना करने की महत्वता और लचीलापन सिखाती है।

इस कहावत का उपयोग सामाजिक जीवन में कैसे किया जा सकता है?

सामाजिक जीवन में, इस कहावत का उपयोग लोगों को समाज में मौजूद लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के प्रति जागरूक करने के लिए किया जा सकता है।

व्यक्तिगत जीवन में इस कहावत को कैसे लागू किया जा सकता है?

व्यक्तिगत जीवन में, इस कहावत को लागू करने का अर्थ है कि हमें अपने जीवन में लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के प्रति सजग और धैर्यवान बने रहना चाहिए।

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