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कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई, अर्थ, प्रयोग (Koyal hoye na ujli, Sau man sabun lai)

परिचय: “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई” यह हिंदी की एक प्रचलित कहावत है, जो यह दर्शाती है कि किसी भी व्यक्ति का स्वभाव या प्रकृति आसानी से नहीं बदलती, चाहे कितना भी प्रयास क्यों न किया जाए।

अर्थ: कहावत का शाब्दिक अर्थ है कि चाहे कोयल को कितना भी साबुन से धोया जाए, उसका काला रंग उजला नहीं होता। यहाँ, ‘कोयल’ का प्रतीकात्मक अर्थ है किसी का अपरिवर्तनीय स्वभाव।

उपयोग: इस कहावत का उपयोग तब होता है जब किसी के स्वभाव या आदतों में बदलाव लाने के प्रयासों की व्यर्थता को दर्शाना होता है।

उदाहरण:

-> मान लीजिए, एक व्यक्ति जो हमेशा झूठ बोलता है, उसे बहुत समझाया जाता है, लेकिन वह अपनी आदत नहीं बदलता। इस स्थिति में कहा जा सकता है, “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई”।

समापन: इस प्रकार, “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई” कहावत हमें यह सिखाती है कि किसी का स्वभाव या प्रकृति आसानी से नहीं बदलती, चाहे उसे कितना भी परिश्रम क्यों न किया जाए। यह कहावत हमें स्वीकार्यता और यथार्थवाद की महत्वता को समझने की प्रेरणा देती है।

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कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई कहावत पर कहानी:

एक बार की बात है, एक छोटे से गाँव में विकास नाम का एक युवक रहता था। विकास की एक आदत थी – वह अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झूठ बोला करता था। उसके माता-पिता, दोस्त, और गाँव वाले सभी उसे बार-बार समझाते कि वह अपनी इस आदत को छोड़ दे, लेकिन विकास की आदत में कोई बदलाव नहीं आता।

एक दिन, गाँव में एक बड़ा समारोह था, और विकास ने वहाँ भी अपनी आदत के अनुसार एक झूठी कहानी सुना दी। इस बार, उसके झूठ का पर्दाफाश हो गया और लोगों ने उसे बहुत फटकार लगाई। विकास की माँ ने उदास होकर कहा, “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई।” उनका मतलब था कि चाहे वे कितना भी प्रयास करें, विकास की आदत में सुधार नहीं होता।

विकास ने इस घटना से सबक लिया और अपने आप पर काम करने का फैसला किया। उसने महसूस किया कि बदलाव के लिए पहला कदम खुद से शुरू होता है।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई” कहावत के अनुसार, किसी की प्रकृति या स्वभाव में बदलाव लाना आसान नहीं होता। हालांकि, यह भी सच है कि अगर कोई व्यक्ति खुद में बदलाव लाने का संकल्प ले, तो वह अवश्य ही सफल हो सकता है।

शायरी:

चाहे लाओ साबुन की नदियाँ, कोयल का रंग न बदले,
“कोयल होय न उजली”, ये कहावत सच्चाई खोले।
जैसे कोई अपना रूप न बदले, चाहे जितना रंग डाले,
वैसे ही इंसान का स्वभाव, वक्त के साथ न संभाले।

स्वभाव की गहराई में, छिपी होती है आदतें पुरानी,
“सौ मन साबुन लाई” पर, रहती हैं वही कहानी।
जिस तरह बदले न समंदर, चाहे रेत में खोज लाखों,
वैसे ही इंसानी फितरत, बदले न चाहे जितनी बातों।

हर रूप में छिपा होता है, इंसान का असली चेहरा,
“कोयल होय न उजली”, ये सिखाती है हमें गहरा।
जीवन के हर मोड़ पर, निखरता है अपना अस्तित्व,
स्वभाव नहीं बदलता, चाहे लाओ कितना भी प्रयत्न।

 

कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।


Hindi to English Translation of कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई – Koyal hoye na ujli, Sau man sabun lai Proverb:

Introduction: “Koyal hoye na ujli, Sau man sabun lai” is a prevalent Hindi proverb that illustrates the idea that a person’s nature or character does not easily change, no matter how much effort is made.

Meaning: The literal meaning of the proverb is that no matter how much you wash a crow with soap, its black color does not turn white. Here, ‘crow’ symbolically represents someone’s unchangeable nature.

Usage: This proverb is used when highlighting the futility of trying to change someone’s nature or habits.

Examples:

-> Suppose a person who always lies is repeatedly advised to change, but he does not alter his habit. In this situation, it can be said, “Koyal hoye na ujli, Sau man sabun lai.”

Conclusion: Thus, the proverb “Koyal hoye na ujli, Sau man sabun lai” teaches us that a person’s nature or character does not easily change, no matter how much effort is exerted. This proverb encourages us to understand the importance of acceptance and realism.

Story of Koyal hoye na ujli, Sau man sabun lai Proverb in English:

Once upon a time, in a small village, there lived a young man named Vikas. Vikas had a habit – he often lied about trivial matters. His parents, friends, and fellow villagers repeatedly advised him to give up this habit, but Vikas’s habit did not change.

One day, there was a big celebration in the village, and Vikas, following his usual habit, told a false story there too. This time, his lie was exposed, and the people scolded him severely. Vikas’s mother, feeling sad, said, “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई.” She meant that no matter how much they tried, Vikas’s habit did not improve.

Vikas learned a lesson from this incident and decided to work on himself. He realized that the first step towards change starts with oneself.

This story teaches us that, as per the proverb “कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई,” changing one’s nature or behavior is not easy. However, it is also true that if a person resolves to change themselves, they can indeed be successful.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly.

FAQs:

इस कहावत का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

समाज में इस कहावत का प्रभाव यह है कि यह लोगों को यह सिखाती है कि प्रकृति के नियमों को बदलना या किसी के मूल स्वभाव को बदलना कठिन है।

इस कहावत का व्यक्तिगत जीवन में क्या महत्व है?

व्यक्तिगत जीवन में, यह कहावत हमें सिखाती है कि हमें लोगों को उनकी प्राकृतिक विशेषताओं के लिए स्वीकार करना चाहिए।

इस कहावत का शिक्षा के क्षेत्र में क्या प्रभाव है?

शिक्षा के क्षेत्र में, यह कहावत यह बताती है कि हर विद्यार्थी की अपनी एक अलग प्रकृति होती है और उसे उसी अनुरूप शिक्षित किया जाना चाहिए।

इस कहावत का आधुनिक समय में क्या उपयोग है?

आधुनिक समय में, यह कहावत यह दर्शाती है कि व्यक्ति या परिस्थितियों की बुनियादी प्रकृति शायद ही कभी बदलती है, चाहे कितने भी प्रयास किए जाएँ।

इस कहावत का नैतिक संदेश क्या है?

इस कहावत का नैतिक संदेश यह है कि हमें चीजों और व्यक्तियों को उनकी प्राकृतिक विशेषताओं के साथ स्वीकार करना चाहिए और उन्हें बदलने की अनावश्यक कोशिश नहीं करनी चाहिए।

इस कहावत का व्यावसायिक जीवन में क्या महत्व है?

व्यावसायिक जीवन में, यह कहावत यह बताती है कि कर्मचारियों और सहकर्मियों की प्राकृतिक प्रतिभा और क्षमता को पहचानना और स्वीकार करना महत्वपूर्ण है।

इस कहावत का राजनीतिक दृष्टिकोण से क्या महत्व है?

राजनीतिक दृष्टिकोण से, यह कहावत यह दर्शाती है कि राजनीतिज्ञों और नेताओं की प्राकृतिक प्रवृत्तियां और नीतियां शायद ही बदलती हैं, चाहे कितने भी प्रयास किए जाएँ।

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