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जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग, अर्थ, प्रयोग(Jut-jut maren bailwa, Baithe khay turang)

“जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग” एक हिंदी कहावत है जो असमानता और श्रम के शोषण पर प्रकाश डालती है। इस कहावत का शाब्दिक अर्थ है, “बैल खेतों में मेहनत से जुताई करते हैं, जबकि घोड़े बैठकर आराम से खाते हैं।” यह कहावत उस स्थिति का वर्णन करती है जब एक व्यक्ति या समूह कठिन परिश्रम करता है, लेकिन उसके लाभ का आनंद कोई और उठाता है।

परिचय: यह कहावत भारतीय समाज में प्रचलित है और अक्सर उन परिस्थितियों में इस्तेमाल की जाती है जहाँ अन्याय और शोषण की बात सामने आती है। यह किसानों के जीवन और उनके द्वारा किए गए कठोर श्रम की एक छवि प्रस्तुत करती है, जबकि उच्च वर्ग इस श्रम का लाभ उठाते हैं।

अर्थ: इस कहावत का मुख्य संदेश यह है कि श्रम और सफलता के बीच हमेशा एक सीधा संबंध नहीं होता। कई बार, कठिन परिश्रम करने वाले लोगों को उनकी मेहनत का उचित लाभ नहीं मिल पाता, जबकि दूसरे लोग, जो कम या कोई श्रम नहीं करते, उन्हें अधिक लाभ मिलता है।

उपयोग: इस कहावत का प्रयोग आमतौर पर उन स्थितियों में किया जाता है जहां श्रमिक वर्ग का शोषण होता है। यह नौकरी के क्षेत्र में, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दर्शाने वाली स्थितियों में, या फिर सामाजिक न्याय की बात करते समय प्रयोग की जा सकती है।

उदाहरण:

-> एक उदाहरण के तौर पर, यदि एक कारखाने के मजदूर दिन-रात कठिन परिश्रम करते हैं, लेकिन कारखाने का मालिक ही सभी मुनाफे का लाभ उठाता है, तो इस स्थिति को इस कहावत के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है।

समापन: “जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग” कहावत समाज में मौजूद श्रम और सफलता के असमान वितरण को रेखांकित करती है। यह हमें उन लोगों के प्रति सहानुभूति और समर्थन दिखाने का संदेश देती है जो अपने श्रम के उचित प्रतिफल से वंचित रह जाते हैं।

जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग कहावत पर कहानी:

एक गाँव में दो पड़ोसी रहते थे, अभय और अनुज। अभय एक मेहनती किसान था, जबकि अनुज एक धनी जमींदार। अभय के पास एक भरोसेमंद और मजबूत बैल था, जिसका नाम गोलू था। अभय हर दिन सुबह से शाम तक गोलू के साथ खेतों में काम करता था। वहीं, अनुज के पास एक सुंदर घोड़ा था, जिसे वह सिर्फ शान के लिए पालता था।

एक दिन, अभय के खेतों में फसल अच्छी हुई। लेकिन उसकी सारी मेहनत का फल अनुज ने अपने नाम कर लिया, क्योंकि वह जमींदार था। अभय और गोलू की मेहनत का कोई मोल नहीं समझा गया। इसी बीच, अनुज अपने घोड़े पर सवार होकर गाँव में घूमता रहता और लोगों से तारीफें बटोरता।

अभय को यह देखकर बहुत दुख हुआ। उसने सोचा, “मैं और मेरा बैल दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन इसका लाभ अनुज उठाता है।” उसे याद आया वह पुरानी कहावत – “जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग।” यह सोचकर अभय ने ठान लिया कि वह अपनी मेहनत का सही मूल्य समझेगा और अपने हक के लिए लड़ेगा।

इस कहानी के माध्यम से हमें सिखने को मिलता है कि हर व्यक्ति की मेहनत का मोल होता है और उसे उसके श्रम का उचित प्रतिफल मिलना चाहिए। यह कहावत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी चाहिए और शोषण के खिलाफ खड़े होना चाहिए।

शायरी:

जुत-जुत में बैल थके, तुरंग खाय आराम से,

मेहनत का हक यहाँ, कोई और ले जाता तमाम से।

खेतों में पसीना बहे, फिर भी रहे नाम किसी और का,

दुनिया की रीत निराली, मेहनती का हक मारा जाता और का।

हम तो बैल बन जुते, फिर भी देखे ख्वाब उड़ान के,

इंसाफ की राह देखें, चल पड़े हम पहचान के।

जिंदगी के मेले में, हर शख्स बना खिलाड़ी,

मेहनत कर भी बैल सा, तुरंग ले जाए सारी बाजी।

कहानी हर मजदूर की, यहाँ तक कि हर इंसान की,

मेहनत और हक की लड़ाई, ये किस्सा हर जुबान की।

 

जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।


Hindi to English Translation of जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग – Jut-jut maren bailwa, Baithe khay turang Proverb:

“Jut-jut maren bailwa, Baithe khay turang” is a Hindi proverb that sheds light on inequality and the exploitation of labor. Its literal meaning is, “The oxen toil in the fields while the horses eat comfortably without working.” This proverb describes a situation where one person or group works hard, but someone else reaps the benefits.

Introduction: This proverb is prevalent in Indian society and is often used in situations where injustice and exploitation are evident. It presents a picture of the life of farmers and their hard labor, while the upper class reaps the benefits of this labor.

Meaning: The main message of this proverb is that there isn’t always a direct relationship between labor and success. Often, those who work hard do not receive the appropriate benefits of their labor, while others who do little or no work reap greater rewards.

Usage: This proverb is commonly used in situations where the working class is exploited. It can be applied in the workplace, in situations depicting social and economic inequalities, or in discussions about social justice.

Examples:

-> For instance, if the workers in a factory toil day and night, but the owner of the factory enjoys all the profits, this situation can be expressed using this proverb.

Conclusion: The proverb “जुत-जुत मरें बैलवा, बैठे खाय तुरंग” highlights the unequal distribution of labor and success in society. It conveys a message of empathy and support for those who are deprived of the rightful rewards of their labor.

Story of Jut-jut maren bailwa, Baithe khay turang Proverb in English:

In a small town lived a young man named Anuj. Anuj was a very cultured and respectful person. He always addressed his elders with ‘Ji’ and showed them great respect.

One day, Anuj got an opportunity to work for the town’s biggest businessman, Mr. Sharma. In their first meeting, Anuj addressed Mr. Sharma as ‘Sharma Ji’. Mr. Sharma was very impressed with his behavior.

Mr. Sharma noticed that Anuj not only respected him but also addressed his colleagues and customers with the same level of respect. Everyone, influenced by Anuj’s respectful behavior, started calling him ‘Anuj Ji’ in return.

In a short time, Anuj won everyone’s heart with his work and his behavior. Mr. Sharma offered him a significant position in his business. Anuj realized that his habit of saying ‘Ji’ had helped him reach this position.

This story teaches us that the proverb “Say Ji, be called Ji” means that when we respect others, we in turn are respected. This is not just a behavioral principle, but also an important mantra for success in life.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly

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