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जिसका खाना, उसी पर गुर्राना अर्थ, प्रयोग (Jiska khana, Usi par guarrana)

“जिसका खाना, उसी पर गुर्राना” एक प्रचलित हिंदी मुहावरा है, जिसका अर्थ होता है किसी के उपकार का बुरा प्रतिफल देना या किसी की मदद करने के बाद उसी पर अकृतज्ञता दिखाना। यह मुहावरा अक्सर उन स्थितियों में प्रयोग किया जाता है जहां कोई व्यक्ति उसी व्यक्ति के खिलाफ जाता है या उसे नुकसान पहुंचाता है जिसने उसकी मदद की हो।

परिचय: यह मुहावरा अक्सर उन परिस्थितियों में इस्तेमाल होता है जब कोई व्यक्ति उसी व्यक्ति के प्रति अकृतज्ञता दिखाता है जिसने उसे आश्रय या सहायता प्रदान की हो। यह मुहावरा उस व्यवहार की निंदा करता है जहां लाभ प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अहसान फविशालोशी करता है।

अर्थ: “जिसका खाना, उसी पर गुर्राना” का शाब्दिक अर्थ है कि जिसके द्वारा खाना खिलाया जाता है, उसी के खिलाफ गुर्राना या गुस्सा दिखाना। यहां ‘खाना’ और ‘गुर्राना’ शब्दों का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप से होता है। ‘खाना’ से अभिप्राय किसी की सहायता या उपकार से है, और ‘गुर्राना’ का अर्थ है कृतघ्नता या आक्रोश प्रदर्शित करना।

प्रयोग: इस मुहावरे का प्रयोग तब किया जाता है जब कोई व्यक्ति उस व्यक्ति या संस्था के खिलाफ बुराई करता है जिसने उसकी मदद की हो। यह एक नकारात्मक व्यवहार को दर्शाता है और अक्सर ऐसे व्यक्तियों के लिए उपयोग किया जाता है जो कृतघ्न होते हैं।

उदाहरण:

-> विशाल ने अनुभव की बहुत मदद की, लेकिन अनुभव ने बाद में उसी विशाल के खिलाफ षड्यंत्र रचा। यह तो वही बात हुई ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’।

-> कंपनी ने उसे जब नौकरी से निकाला तो उसने कंपनी के खिलाफ ही केस कर दिया, यह ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’ का सही उदाहरण है।

निष्कर्ष: यह मुहावरा समाज में अकृतज्ञता और कृतघ्नता के व्यवहार की ओर इशारा करता है। यह हमें यह सिखाता है कि हमें हमेशा उन लोगों का सम्मान करना चाहिए जिन्होंने हमारी मदद की है और उनके प्रति कृतज्ञता दिखानी चाहिए। यह मुहावरा हमें नैतिकता और आभार का पाठ पढ़ाता है, और साथ ही यह याद दिलाता है कि किसी के उपकार का बदला बुराई से नहीं चुकाना चाहिए। इस तरह के मुहावरे हमारी संस्कृति और समाज के नैतिक मूल्यों को मजबूत करते हैं और व्यक्तियों को अच्छे और उचित व्यवहार की ओर प्रेरित करते हैं।

जिसका खाना, उसी पर गुर्राना मुहावरा पर कहानी:

किसी गांव में सुरेंद्र नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसके पास खेती के लिए जमीन नहीं थी, इसलिए वह दूसरों के खेतों में मजदूरी करके अपना गुजारा करता था। एक दिन, सुरेंद्र को अपने गांव के एक धनी व्यापारी, प्रेमचंद्र के खेत में काम करने का मौका मिला। प्रेमचंद्र ने उसे बहुत ही कम मजदूरी पर काम पर रखा, लेकिन सुरेंद्र को इससे भी संतोष था, क्योंकि उसे काम की सख्त जरूरत थी।

समय के साथ, सुरेंद्र ने अपनी मेहनत और लगन से प्रेमचंद्र के खेत को उपजाऊ बना दिया। उसकी कड़ी मेहनत से प्रेमचंद्र को बहुत लाभ हुआ। देखते ही देखते, प्रेमचंद्र गांव का सबसे अमीर व्यापारी बन गया। इस बीच, सुरेंद्र को भी थोड़ी बहुत समृद्धि मिली और उसने अपना छोटा सा खेत खरीद लिया।

लेकिन समय के साथ प्रेमचंद्र का स्वभाव बदल गया। वह अब सुरेंद्र को नीचा दिखाने लगा और उसके खिलाफ गांव वालों में बुराई करने लगा। सुरेंद्र ने जब यह सुना, तो उसे बहुत दुःख हुआ। उसने सोचा, “मैंने तो इसे अपना सब कुछ दिया, और बदले में इसने मुझे धोखा दिया। यह तो ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’ वाली बात हो गई।

सुरेंद्र ने फैसला किया कि वह प्रेमचंद्र के खेत में काम नहीं करेगा और अपने खेत पर ही ध्यान देगा। उसने अपनी मेहनत और लगन से अपने खेत को भी उपजाऊ बनाया। धीरे-धीरे उसका खेत भी फलने-फूलने लगा।

इस बीच, प्रेमचंद्र का खेत बिना सुरेंद्र के मेहनत के सूखने लगा। उसे अहसास हुआ कि उसने सुरेंद्र के साथ जो व्यवहार किया, वह गलत था। उसने सुरेंद्र से माफी मांगी और उसे वापस काम पर रखने की पेशकश की, लेकिन सुरेंद्र ने विनम्रता से मना कर दिया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि किसी के उपकार का बदला बुराई से नहीं चुकाना चाहिए। ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’ एक नकारात्मक व्यवहार है जो न केवल दूसरों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि अंततः खुद को भी हानि पहुंचाता है। इसलिए हमेशा उनके प्रति कृतज्ञता दिखानी चाहिए जिन्होंने हमारी मदद की हो।

शायरी:

जिसकी छाया में पले, उसी शजर पर वार किया,

किस्सा ये दुनिया ने बहुत, ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’ का किया।

उपकार की धरती पर, नाशुक्री के बीज बोये,

जिन हाथों ने दाना दिया, उन्हीं हाथों को खोये।

बदले की आंधी में, सच्चाई के दीप जलाये,

जिसके दर पर आस लगाई, उसी ने दर को भुलाये।

दुनिया की इस रीत में, दिल को जो थोड़ा बहलाये,

उसी चिराग के तले, अंधेरों का मेला सजाये।

हर एक उपकार की कहानी, ये दास्ताँ बयां करती,

जिस थाली में खाया, उसी में छेद ये दुनिया करती।

 

जिसका खाना, उसी पर गुर्राना शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।

Hindi to English Translation of जिसका खाना, उसी पर गुर्राना – Jiska khana, Usi par guarrana Idiom:

“जिसका खाना, उसी पर गुर्राना” is a common Hindi idiom, which means to return someone’s kindness with ingratitude or to show ungratefulness towards someone who has helped. This idiom is often used in situations where a person turns against or harms the very person who has assisted them.

Introduction: This idiom is frequently used in circumstances where a person shows ingratitude towards someone who has provided them shelter or assistance. The idiom condemns the behavior of receiving benefits and then showing unthankfulness or disloyalty.

Meaning: The literal translation of “जिसका खाना, उसी पर गुर्राना” is ‘to growl at the one who feeds you.’ Here, the usage of ‘खाना’ (eating) and ‘गुर्राना’ (growling) is symbolic. ‘खाना’ implies receiving help or favor, and ‘गुर्राना’ means showing ingratitude or anger.

Usage: This idiom is used when a person speaks ill or acts against the individual or organization that has helped them. It depicts a negative behavior and is often used for those who are ungrateful.

Example:

-> Vishal helped Anubhav a lot, but later Anubhav conspired against the same Vishal. This is exactly the case of ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’.

-> When the company fired him, he sued the company itself, a perfect example of ‘जिसका खाना, उसी पर गुर्राना’.

Conclusion: This idiom points towards the behavior of ingratitude and unthankfulness in society. It teaches us to always respect and show gratitude to those who have helped us. The idiom educates us on ethics and gratitude, and also reminds us not to repay someone’s kindness with evil. Such idioms strengthen the moral values of our culture and society, inspiring individuals towards good and appropriate behavior.

Story of ‌‌Jiska khana, Usi par guarrana Idiom in English:

In a village, there lived a poor farmer named Surendra. He had no land for farming, so he made his living by working as a laborer in others’ fields. One day, Surendra got an opportunity to work in the fields of a wealthy merchant of the village, Premchandra. Premchandra employed him for a very low wage, but Surendra was content as he desperately needed the job.

Over time, with his hard work and dedication, Surendra made Premchandra’s fields fertile. His hard work greatly benefited Premchandra. Eventually, Premchandra became the richest businessman in the village. Meanwhile, Surendra also gained some prosperity and managed to buy a small piece of land for himself.

However, as time passed, Premchandra’s attitude changed. He started belittling Surendra and spoke ill of him among the villagers. When Surendra heard this, he was deeply hurt. He thought, “I gave him my everything, and in return, he deceived me. This is just like the saying ‘biting the hand that feeds you.'”

Surendra decided not to work in Premchandra’s fields anymore and focused on his own land. He put his hard work and dedication into his field and gradually, it too began to flourish.

Meanwhile, Premchandra’s fields started to wither away without Surendra’s hard work. Premchandra realized his mistake and apologized to Surendra, offering him his job back, but Surendra politely declined.

This story teaches us that one should not repay someone’s kindness with evil. The behavior of ‘biting the hand that feeds you’ is negative, harming not only others but ultimately oneself as well. Thus, we should always show gratitude towards those who have helped us.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly

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