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आरत काह न करै कुकरमू, अर्थ, प्रयोग(Aarat kaah na kare kukramu)

परिचय: हिंदी की प्राचीन कहावत “आरत काह न करै कुकरमू” का उपयोग अक्सर जीवन की विडंबनाओं को समझाने के लिए किया जाता है।

अर्थ: इस कहावत का अर्थ है कि एक दु:खी या परेशान व्यक्ति कभी-कभी अच्छे और बुरे कर्मों के बीच का अंतर नहीं समझ पाता। दु:ख और पीड़ा के समय में, मनुष्य की नैतिकता परीक्षण में आ जाती है।

उपयोग: इस कहावत का प्रयोग उन परिस्थितियों में किया जाता है, जब किसी के कठिन समय या दु:ख के कारण उसके निर्णयों पर प्रभाव पड़ता है।

उदाहरण:

-> मान लीजिए, एक व्यक्ति जो गंभीर रूप से परेशान है, वह कठिनाई के समय में गलत निर्णय ले सकता है, जैसे कि अपराध में लिप्त होना या नैतिकता की सीमाओं को लांघना।

समापन: “आरत काह न करै कुकरमू” कहावत हमें यह सिखाती है कि दु:ख और पीड़ा के समय में व्यक्ति का नैतिक और आत्मिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए, हमें ऐसे समय में संयम और समझदारी के साथ निर्णय लेना चाहिए और व्यक्ति की परिस्थितियों को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

इस पोस्ट में कहावत के पीछे की सोच को सामाजिक और नैतिक परिप्रेक्ष्य से समझाया गया है, जो बुद्धिमानी से भरी जीवन की शिक्षाओं को दर्शाता है।

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आरत काह न करै कुकरमू कहावत पर कहानी:

बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में मुनीश नाम का एक ईमानदार और मेहनती किसान रहता था। उसकी खेती बहुत अच्छी चलती थी और वह अपने परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था। लेकिन एक वर्ष, उसके गाँव में भयानक सूखा पड़ा। उसकी सारी फसलें सूख गईं और वह गहरे कर्ज में डूब गया।

दु:ख और निराशा में डूबे मुनीश को अब अच्छे और बुरे का भेद समझ में नहीं आता था। एक दिन, उसे पता चला कि गाँव के एक धनी व्यक्ति के घर में बहुत सारा धन है। मुनीश ने सोचा कि अगर वह थोड़ा सा धन चुरा ले, तो वह अपने कर्ज से मुक्त हो सकता है और फिर से अपनी खेती शुरू कर सकता है।

उस रात, वह धनी व्यक्ति के घर में घुसा और कुछ धन चुराने लगा। लेकिन तभी उसे एक बुजुर्ग की आवाज़ सुनाई दी, जो कह रहे थे, “आरत काह न करै कुकरमू।” मुनीश ने मुड़कर देखा और पाया कि वह बुजुर्ग उसी धनी व्यक्ति के पिता थे।

बुजुर्ग ने मुनीश को समझाया, “बेटा, तुम्हारा दु:ख मुझे समझ आता है, लेकिन गलत रास्ते पर चलकर तुम अपने दु:ख को कम नहीं कर सकते। तुम्हारे अंदर का अच्छा इंसान अभी भी जिंदा है।”

मुनीश को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह उस बुजुर्ग के पैरों पर गिर पड़ा। बुजुर्ग ने उसे क्षमा कर दिया और उसके कर्ज का भुगतान करने में मदद की।

मुनीश ने इस घटना से सीख ली कि दु:ख के समय में भी अच्छे और बुरे के बीच का फर्क समझना जरूरी है।

निष्कर्ष:

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि “आरत काह न करै कुकरमू” का अर्थ है कि दु:ख के समय में भी हमें अपने नैतिक मूल्यों को नहीं भूलना चाहिए और सही निर्णय लेना चाहिए।

शायरी:

बिखरे हुए ख्वाबों का ताना-बाना बुनते हुए,

दुखों की राह में, फिर भी अदब से चलते हुए।

“आरत काह न करै कुकरमू”, यह सोच समझाती है,

जीवन के हर मोड़ पर, सच्चाई का आईना दिखाती है।

बेबसी में भी जो रखे इंसानियत का ख्याल,

वही तो है असली शायर, दिलों की जुबां बने हाल।

दुःख में भटकना आसान, पर खुद को संभालना बड़ी बात,

जिंदगी के इस सफर में, रखो नैतिकता की सौगात।

गिरकर भी जो उठ जाए, हर बार फिर से खड़ा हो,

दुखों की आंधी में भी, जो ना अपनी सोच से लड़ा हो।

“आरत काह न करै कुकरमू”, यह सबक याद रखना,

जीवन की कठिनाई में भी, सच्चाई का दामन थाम कर रखना।

 

आरत काह न करै कुकरमू शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।


Hindi to English Translation of आरत काह न करै कुकरमू – Aarat kaah na kare kukramu Proverb:

Introduction: The ancient Hindi proverb “Aarat kaah na kare kukramu” is often used to explain the ironies of life.

Meaning: This proverb means that a person who is in distress or troubled may sometimes fail to distinguish between good and bad deeds. During times of sorrow and suffering, a person’s morality is put to the test.

Usage: This proverb is applied in situations where someone’s decisions are influenced by their difficult times or sorrow.

Examples:

-> Consider a person who is deeply troubled. In times of hardship, they might make wrong decisions, such as engaging in criminal activities or crossing moral boundaries.

Conclusion: The proverb “Aarat kaah na kare kukramu” teaches us that a person’s moral and spiritual balance can be disturbed during times of sorrow and pain. Therefore, we should make decisions with patience and wisdom during such times and try to understand the circumstances of the individual.

This post explains the thought behind the proverb from a social and ethical perspective, showcasing the lessons of a wise life.

Story of Aarat kaah na kare kukramu Proverb in English:

Long ago, in a village, there lived an honest and hardworking farmer named Munish. His farming was prosperous, and he led a happy life with his family. However, one year, a terrible drought struck his village. His crops dried up, plunging him into deep debt.

Engulfed in sorrow and despair, Munish could no longer distinguish between right and wrong. One day, he learned that a wealthy man in the village had a lot of money. Munish thought that if he stole a little money, he could free himself from debt and restart his farming.

That night, he sneaked into the rich man’s house and began to steal some money. But then he heard an elderly man’s voice saying, “A distressed person knows not the difference between right and wrong.” Munish turned and saw that the elderly man was the father of the wealthy man.

The elder explained, “Son, I understand your sorrow, but walking the wrong path will not lessen your suffering. The good person inside you is still alive.”

Munish realized his mistake and fell at the elder’s feet. The elder forgave him and helped pay off his debt.

From this incident, Munish learned that even in times of sorrow, it is essential to discern between good and evil.

Conclusion:

This story teaches us that the meaning of “A distressed person knows not the difference between right and wrong” is that even in times of sorrow, we should not forget our moral values and make the right decisions.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly

FAQs:

क्या इस कहावत का कोई इतिहासिक प्रमाण है?

इस कहावत का कोई विशेष इतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन यह लोकप्रिय भारतीय कहावतों में से एक है जो जीवन के सामान्यता और समर्पण के बारे में सिखाता है।

इस कहावत में “कुकरमू” का क्या मतलब है?

“कुकरमू” एक प्रकार की छद्मी वस्त्र है जो उत्तर भारतीय समाज में पहना जाता था, इसे यहाँ एक सिम्बल के रूप में उपयोग किया गया है जो किसी की कठिनाईयों को छुपाने की अवस्था को दर्शाता है।

क्या यह कहावत किसी विशेष समाज या स्थान से जुड़ी है?

नहीं, यह कहावत सामान्यत: भारतीय साहित्य और विचारशीलता से जुड़ी है और किसी विशेष समाज या स्थान से संबंधित नहीं है।

कुकरमू का इस कहावत में कैसे उपयोग हुआ है?

“कुकरमू” यहाँ पर एक परिस्थिति को दर्शाने के लिए उपयोग हुआ है, जो सीधे तरीके से नहीं हो सकती लेकिन उसका सामना करना जरूरी है।

इस कहावत का उदाहरण कौन-कौन से हो सकते हैं?

इस कहावत का उदाहरण किसी भी व्यक्ति या स्थिति के साथ जोड़ा जा सकता है, जहाँ सही समय पर सही तरीके से प्रतिसाद देना आवश्यक होता है।

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