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खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता अर्थ, प्रयोग (Khaiye manbhata, Pahniye jagbhata)

परिचय: “खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता” यह एक प्रचलित हिंदी मुहावरा है जो जीवन में एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देता है। यह मुहावरा हमें यह सिखाता है कि हमें अपने भोजन के चुनाव में तो अपनी पसंद को प्राथमिकता देनी चाहिए, लेकिन वस्त्रों के मामले में समाज की नज़र में आने वाली चीज़ों का चयन करना चाहिए।

अर्थ: मुहावरे का तात्पर्य है कि व्यक्ति को अपने खान-पान में अपनी इच्छा के अनुसार चुनाव करना चाहिए क्योंकि यह उसकी व्यक्तिगत पसंद और स्वास्थ्य से जुड़ा होता है, लेकिन जब बात वस्त्रों की आती है, तो समाज के नियमों और रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए चयन करना चाहिए।

प्रयोग: यह मुहावरा आमतौर पर उस समय प्रयोग किया जाता है जब किसी को व्यक्तिगत पसंद और सामाजिक मानदंडों के बीच संतुलन बनाने की सलाह देनी होती है।

उदाहरण:

अभय अपने खान-पान में बहुत ही सादगीपसंद व्यक्ति हैं और अक्सर घर का बना साधारण भोजन ही खाना पसंद करते हैं, लेकिन जब वह किसी समारोह में जाते हैं, तो वह समाज की नज़र में उचित माने जाने वाले वस्त्र पहनते हैं। इससे “खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता” मुहावरे का अर्थ स्पष्ट होता है।

निष्कर्ष: “खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता” मुहावरा हमें यह सिखाता है कि जीवन में व्यक्तिगत पसंद और सामाजिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। यह हमें अपनी आंतरिक इच्छाओं का सम्मान करने के साथ-साथ सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने की भी प्रेरणा देता है। इस प्रकार, यह हमें एक संतुलित और सद्भावपूर्ण जीवन जीने की कला सिखाता है।

खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता मुहावरा पर कहानी:

एक छोटे से गाँव में अनुज नाम का एक युवक रहता था। अनुज को खाने के लिए अपनी माँ के हाथ का बना सादा और पौष्टिक भोजन ही सबसे ज्यादा पसंद था। वह बाहर के खाने में रुचि नहीं रखता था, चाहे वह कितना ही लजीज क्यों न हो।

एक दिन, गाँव में एक बड़ी शादी का आयोजन हुआ। सभी गाँव वाले उस शादी में जाने के लिए उत्साहित थे। अनुज भी शादी में जाने के लिए तैयार हो रहा था। अपनी पसंद के अनुसार, अनुज ने खाने में सादगी बरती लेकिन जब बात वस्त्रों की आई तो उसने समाज के अनुरूप सुंदर और आकर्षक पोशाक पहनने का निर्णय लिया।

शादी में जाकर अनुज ने देखा कि सभी लोग उसकी पोशाक की प्रशंसा कर रहे थे। उसके चुने हुए वस्त्रों ने न केवल उसे समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाया बल्कि उसके व्यक्तित्व को भी निखारा।

इस घटना से अनुज को “खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता” मुहावरे का सच्चा अर्थ समझ में आया। उसने महसूस किया कि अपनी पसंद के अनुसार खाना उसकी व्यक्तिगत खुशी के लिए था, लेकिन समाज में स्वीकार्यता और सम्मान पाने के लिए वस्त्रों का चुनाव समाज की नजरों को ध्यान में रखकर करना जरूरी था।

इस कहानी के माध्यम से हमें यह सीखने को मिलता है कि जीवन में संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत पसंद और सामाजिक मान्यताओं के बीच संतुलन स्थापित करना हमें एक सुखी और सम्मानित जीवन जीने की ओर ले जाता है।

शायरी:

खाने में जो मन भाए, पहनने में दुनिया सजाए,
यही जीवन का सूत्र है, जिसे हर दिल ने अपनाए।

मन की सादगी में खोजें, जीवन के सच्चे स्वाद,
पहनावे में लेकिन, दुनिया के रंग बरसाएं फिर याद।

खाइए मनभाता, लेकिन पहनिए जगभाता,
इस संसार की रीति, यही तो है सबसे सुनाता।

अपने मन की करें पर, दुनिया से न बनें बेगाना,
पहनावे में झलके जग का, मन से रहें सादा।

इस दुनिया में रहकर, अपनी पहचान बनाना,
‘खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता’, जीवन का यही संदेश सुनाना।

मन के खाने में छुपा, जीवन का सच्चा आनंद,
पहनावे से संवारें जग, करें दिलों को बंध।

सादगी में भी खोजें, जीवन के वो मीठे पल,
‘खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता’, जीवन का यह सुन्दर हल।

 

खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।

Hindi to English Translation of खाइए मनभाता, पहनिए जगभाता – Khaiye manbhata, Pahniye jagbhata Idiom:

Introduction: “Khaiye manbhata, Pahniye jagbhata” is a popular Hindi idiom that advises adopting a balanced approach in life. This idiom teaches us that while we should prioritize our preferences in our choice of food, in the matter of clothing, we should select items that are acceptable in the eyes of society.

Meaning: The essence of this idiom is that an individual should choose their diet according to their desire because it is related to their personal preference and health. However, when it comes to clothing, one should make selections respecting the rules and customs of society.

Usage: This idiom is commonly used when advising someone to balance personal preferences and social norms.

Example:

Abhay is a person who prefers simplicity in his diet and often likes to eat simple homemade food. However, when he attends a ceremony, he wears clothes that are deemed appropriate by society. This clarifies the meaning of the idiom “Eat what pleases the heart, wear what pleases the world.”

Conclusion: The idiom “Khaiye manbhata, Pahniye jagbhata” teaches us how to create a balance between personal preferences and social necessities in life. It inspires us to respect our inner desires while also adhering to social decorum. Thus, it teaches us the art of living a balanced and harmonious life.

Story of ‌‌Khaiye manbhata, Pahniye jagbhata Idiom in English:

In a small village lived a young man named Anuj. Anuj preferred simple and nutritious food made by his mother over any outside food, no matter how delicious it might be.

One day, a big wedding was organized in the village. All the villagers were excited to attend the wedding, and so was Anuj. According to his preference, Anuj chose simplicity in his food but decided to wear beautiful and attractive attire that conformed to societal expectations when it came to clothing.

Upon attending the wedding, Anuj noticed that everyone was admiring his outfit. His choice of clothing not only earned him a respectable position in society but also enhanced his personality.

This experience taught Anuj the true meaning of the idiom “Eat what pleases the heart, wear what pleases the world.” He realized that choosing food according to his preference was for his personal happiness, but selecting clothes with society in mind was essential for acceptance and respect in society.

This story teaches us the importance of maintaining balance in life. Establishing a balance between personal preferences and social norms leads us towards a happy and respected life.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly.

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