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बिना चावल के खीर पकाना अर्थ, प्रयोग (Bina chawal ki kheer pakana)

परिचय: हिंदी भाषा के मुहावरे अपने अर्थ और व्यंग्य के लिए जाने जाते हैं। “बिना चावल के खीर पकाना” एक ऐसा ही मुहावरा है, जो एक असंभव कार्य के प्रयास को दर्शाता है।

अर्थ: इस मुहावरे का शाब्दिक अर्थ है कि बिना मुख्य सामग्री के कोई व्यंजन बनाने की कोशिश करना। यह उस स्थिति को व्यक्त करता है जहां किसी कार्य को करने के लिए मुख्य और आवश्यक घटकों का अभाव हो।

प्रयोग: यह मुहावरा आमतौर पर तब प्रयोग में लाया जाता है जब कोई व्यक्ति बिना महत्वपूर्ण संसाधनों या आवश्यक तत्वों के किसी कार्य को करने का प्रयास करता है।

उदाहरण:

-> वह बिना तैयारी के परीक्षा पास करने का प्रयास कर रहा है, यह तो बिना चावल के खीर पकाने जैसा है।

-> सीमित बजट में बड़ी परियोजना को पूरा करना चाहते हैं, यह बिना चावल के खीर पकाने के समान है।

निष्कर्ष: “बिना चावल के खीर पकाना” मुहावरा हमें यह सिखाता है कि किसी भी कार्य को करने के लिए उसके मूलभूत घटकों का होना अत्यंत आवश्यक है। यह मुहावरा हमें यथार्थवादी और व्यावहारिक होने की प्रेरणा देता है।

बिना चावल के खीर पकाना मुहावरा पर कहानी:

बहुत समय पहले, एक दूर देश में, राजा सुरेंद्र सिंह राज्य करते थे। वे बहुत ही उदार और परोपकारी थे। एक दिन, राजा के मन में एक अनोखा विचार आया। उन्होंने सोचा, क्यों न अपने राज्य के लोगों के लिए एक अद्भुत उत्सव का आयोजन किया जाए जिसमें बिना चावल की खीर बनाई जाए।

राजा ने अपने सभी रसोइयों को बुलाया और उन्हें यह अनोखा आदेश दिया। रसोइये हैरान रह गए। उन्होंने राजा से कहा कि बिना चावल के खीर बनाना तो असंभव है। लेकिन राजा ने उन्हें यह कार्य करने का आदेश दिया।

रसोइये ने कई प्रकार के प्रयोग किए, परंतु हर बार वे असफल रहे। खीर तो खीर थी, उसे बिना चावल के कैसे बनाया जा सकता था? अंत में, राजा को भी यह समझ में आया कि वे जो चाह रहे थे, वह वास्तव में असंभव था।

इस कहानी के माध्यम से हमें यह सीखने को मिलता है कि “बिना चावल के खीर पकाना” मुहावरा उस स्थिति को दर्शाता है जब हम बिना महत्वपूर्ण संसाधनों या आवश्यक तत्वों के किसी कार्य को करने का प्रयास करते हैं। यह हमें यथार्थवादी और व्यावहारिक होने की प्रेरणा देता है।

शायरी:

ख्वाबों की खीर में चावल नहीं डाले जाते,

जज्बातों की आँच पर, ये पकते नहीं बस बहलाए जाते।

उम्मीदों के दरिया में तैरती कश्ती बिना पतवार के,

बिना चावल के खीर पकाने जैसे, ख्वाहिशें हैं बेकार के।

दुनिया की राहों में चलते-चलते, ये सोचा हमने,

बिना सच्चाई के सपने, वैसे ही जैसे बिना चावल के खीर के।

जिन्दगी के मेले में, हर शय मिलती है यहाँ,

पर बिना प्यार के दिल, जैसे बिना चावल के खीर की बातें सुनाए जाते हैं।

आसमां के तारों से, कभी चाँद तक जा नहीं सकते,

बिना मेहनत के सफलता, जैसे बिना चावल के खीर का स्वाद नहीं चखा जा सकते।

ये शायरी बताती है, हमें यथार्थ का आईना दिखाती है,

बिना अहम चीजों के, कामयाबी की राह नहीं बनाई जाती है।

 

बिना चावल के खीर पकाना शायरी

आशा है कि आपको इस मुहावरे की समझ आ गई होगी और आप इसका सही प्रयोग कर पाएंगे।

Hindi to English Translation of बिना चावल के खीर पकाना – Bina chawal ki kheer pakana Idiom:

Introduction: Hindi idioms are known for their meaning and wit. “बिना चावल के खीर पकाना” (Trying to cook kheer without rice) is one such idiom, representing the attempt of an impossible task.

Meaning: The literal meaning of this idiom is to try cooking a dish without its main ingredient. It expresses a situation where there is a lack of primary and essential components required to accomplish a task.

Usage: This idiom is commonly used when someone tries to perform a task without important resources or necessary elements.

Example:

-> He is trying to pass the exam without preparation, which is like trying to cook kheer without rice.

-> They want to complete a big project with a limited budget, which is similar to cooking kheer without rice.

Conclusion: The idiom “बिना चावल के खीर पकाना” teaches us that it is extremely necessary to have the fundamental components for any task. This idiom inspires us to be realistic and practical.

Story of ‌‌Bina chawal ki kheer pakana Idiom in English:

Long ago, in a distant land, King Surendra Singh ruled. He was very generous and benevolent. One day, a unique idea came to his mind. He thought, why not organize a wonderful festival for the people of his kingdom where kheer would be made without rice.

The king summoned all his cooks and gave them this unusual order. The cooks were astonished. They told the king that it was impossible to make kheer without rice. But the king ordered them to carry out the task.

The cooks tried various experiments, but every time they failed. Kheer was kheer, how could it be made without rice? In the end, the king also realized that what he wanted was indeed impossible.

This story teaches us that the idiom “बिना चावल के खीर पकाना” (Trying to cook kheer without rice) illustrates the situation when we try to do a task without important resources or necessary elements. It inspires us to be realistic and practical.

 

I hope this gives you a clear understanding of the proverb and how to use it correctly

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